पतंजलि में धूमधाम से मनायी गयी गया धन्वन्तरि जयन्ती

हरिद्वार। हमारी परम्परा महर्षि पतंजलि, चरक, सुश्रुत व धन्वन्तरि की परम्परा रही है तथा हम इन्हीं की परम्परा के वंशज हैं। हम सब उनके प्रतिनिधि प्रतिरूप, उत्तराधिकारी व ऋषि परम्परा के संवाहक हैं। उक्त उद्गार महर्षि ध्सन्वन्तरि की जयन्ती के उपलक्ष्य में पतंजलि योगपीठ स्थित यज्ञशाला में आयोजित कार्यक्रम के दौरान स्वामी रामदेव महाराज ने व्यक्त किए। कार्यक्रम में स्वामी रामदेव तथा आचार्य बालकृष्ण ने उपस्थित पतंजलि परिवार के साथ-साथ समस्त देशवासियों को महर्षि धन्वन्तरि जयन्ती की शुभकामनाएँ दी। स्वामी रामदेव ने कहा कि दीपावली तथा होली हमारे मुख्य पर्व हैं जिनमें यज्ञों का विधान है। योग केवल एक विषय नहीं है अपितु सम्पूर्ण जीवन पद्धति है। योग करने वालों का चरित्र, दृष्टि, आचरण, वाणी तथा व्यवहार शुद्ध व पवित्र होता है। योग पर वैज्ञानिक प्रयोग यदि पूरी दुनिया में कहीं हो रहा है तो वह केवल पतंजलि में हो रहा है। सफेद दाग, हेपेटाइटिस-ए, बी, सी तथा लीवर सिरोसिस जैसे असाध्य रोगों का उपचार पतंजलि ने खोज लिया है। जिसका लाभ आने वाले समय में पूरे विश्व का मिलेगा। पतंजलि ने घुटनों की असहनीय पीड़ा का उपचार भी चूहों पर गहन अनुसंधन कर पीड़ानिल के रूप में खोज निकाला है। आचार्य बालकृष्ण महाराज ने कहा कि आज आयुर्वेद के अवतार पुरुष महर्षि धन्वन्तरि की जयन्ती है। आज का दिन हमारे लिए परम स्मरणीय व वैभवशाली है। हम आयुर्वेद परम्परा के संवाहक हैं। उन्होंने कहा कि पतंजलि के माध्यम से सृजन के अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किए जा रहे हैं। जिनमें आयुर्वेद का संरक्षण-संवर्धन व प्रचार-प्रसार मुख्य है। कोरोना वायरस के संक्रमण से बचाव तथा उपचार हेतु कोरोनिल आज पूरे विश्व में अपना लोहा मनवा रही है। आधुनिक विज्ञान ने भी कोरोनिल के चमत्कार को माना है। अंतर्राष्ट्रीय जनरल मोलेक्यूलेस में कोरोनिल का रिसर्च पेपर प्रकाशित हो चुका है। उन्होंने कहा कि समुद्र मंथन से निकले 14 रत्न हमारी 14 इन्द्रियाँ ही हैं। इनमें पांच ज्ञानेंद्रियाँ- आंख, कान, नाक, जीभ और त्वचा, पांच कर्मेंद्रियाँ- हाथ, पैर, मुँह, गुदा और लिंग तथा चार अंतःकरण- मन बुद्धि चित्त और अहंकार हैं। उन्होंने कहा कि समुद्र मंथन में अमृत कलश तथा महर्षि धन्वन्तरि एक साथ उत्पन्न हुए। साथ ही माँ लक्ष्मी की भी उत्पत्ति हुई जिन्हें महर्षि धन्वन्तरि की बहन माना जाता है। आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि अमृत की बूंदें जहाँ-जहाँ गिरी वहाँ गिलोय उत्पन्न हो गई, इसलिए इसे अमृता भी कहा जाता है। जिस गिलोय के विषय में कोई जानता नहीं था आज उसके औषधीय गुणों के कारण पूरी दुनिया उसे ढूँढ रही है। दोष आयुर्वेद का नहीं, हमारी विस्मृति का है। कार्यक्रम में महामण्डलेश्वर स्वामी हरिचेतनानंद महाराज, स्वामी कमलदास महाराज, पतंजलि विश्वविद्यालय के प्रति कुलपति डा.महावीर, मुख्य महाप्रबंधक ललित मोहन, पतंजलि अनुसंधान संस्थान के उपाध्यक्ष डा.अनुराग वाष्र्णेय, पतंजलि विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक वी.सी.पाण्डेय, बहन साधना के साथ पतंजलि आयुर्वेद व पतंजलि विश्वविद्यालय के प्राध्यापकगण व छात्रा-छात्राएँ उपस्थित रहे।