पितृविर्सजन अमावस्या के साथ ही पितृपक्ष का समापन,नारायणी शिला श्रद्वालुओं के लिए रहा बंद

हरिद्वार। पहली बार कोविड19 यानि कोरोना काल में कई बंदिशों के बीच पितृविर्सजनी अमावस्या के साथ ही इस वर्ष श्राद्ध पक्ष का समापन हो गया। कोरोना काल अनलॉक-4 में बढ़ती कोरोना मरीजों की संख्या को धता बताते हुए पितृविसर्जनी अमावस्या पर श्रृद्धालुओं ने गंगा स्नान कर अपने ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों के निमित्त कर्मकांड कर उनका तर्पण किया और उन्हें मृत्युलोक से विदा किया। श्राद्ध पक्ष का अंतिम दिन होने और शासन-प्रशासन की ओर से हरकी पैड़ी पर यात्रियों के स्नान पर प्रतिबंध की चर्चाओं के बीच बेखौफ श्रृद्धालुओं ने ब्रह्म मुहूर्त में ही हरकी पैड़ी पर पहुंचकर गंगा स्नान कर अपने पितरों के निमित्त तर्पण किया। इस दौरान आसपास के जिलों के साथ-साथ दूसरे राज्यों से आए श्रद्धालु भी हरकी पैड़ी और नारायण शिला पहुंचे। इस दौरान हरकी पैड़ी पर किसी भी तरह की रोक-टोक यात्रियों के लिए नहीं रही। बस, उन्हें कोविड-19 के नियमों का पालन करने की हिदायत लगातार दी जाती रही। पितृपक्ष सम्पन्न होने के साथ ही पितृ अपने लोक लौट गए। पितृविसर्जन अमावस्या के मौके पर श्रद्वालुओं ने हर की पैड़ी पर सहित गंगा के विभिन्न घाटों पर गंगा में डुबकी लगाते हुए अपने अपने पितृों के निमित्त श्राद्वकर्म सम्पन्न कराए। मान्यता है कि श्राद्वपक्ष के अन्तिम दिन अज्ञात पितरों के निमित्त कर्म किये जाते है,इसी के तहत गुरुवार को नागरिकों ने अज्ञात तिथि वाले पितृों के निमित्त तर्पण और दान-पुण्य किया। इस वर्ष एक सितंबर से पितृ पक्ष प्रारंभ हुए थे, जबकि गुरुवार को अमावस्या का दिन रहा। ऐसे में व्यक्तियों ने मान्यतानुसार अपने उन पितृों का श्राद्ध किया जिनकी तिथि उन्हें ज्ञात नहीं है। वहीं जो भूलवश या किसी अन्य कारणवश पितृों का श्राद्ध नहीं कर पाए थे उन्होंने भी अमावस्या के दिन उनका श्राद्ध किया। श्रद्वालुओं ने हरि की पैड़ी,गउघाट,कुशाघाट सहित गंगाघाट के किनारे पितृों के निमित्त पूजन किया। जबकि कई व्यक्ति श्राद्ध पक्ष के अंतिम दिन गोशालाओं में भी गोमाता को चारा खिलाने पहुंचे। मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष में हमारे पितृ यमराज की आज्ञानुसार सूक्ष्म रूप में पृथ्वी लोक पर आते हैं और हमारी ओर से दिए गए श्राद्ध, भोजन, तर्पण आदि को ग्रहण करते हैं। श्राद्ध करने से पितृों को संतुष्टि मिलती है। 
एक महीने बाद होगा नवरात्र
पितृ पक्ष के समापन के बाद हर साल अगले दिन से मां दुर्गा के नवरात्र प्रारंभ हो जाते थे, लेकिन इस वर्ष लगभग 165 वर्ष बाद ऐसा संयोग बन रहा है कि पितृ पक्ष के बाद नवरात्र की बजाय मलमास लग रहे हैं। जहां पितृ पक्ष में विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, नई वस्तुओं की खरीदारी आदि कार्य वर्जित माने जाते हैं वहीं मलमास में भी शादी, मुंडन, गृह प्रवेश को करना शुभ नहीं माना जाता है। ऐसे में शुभ कार्यों को करने के लिए नागरिकों को एक महीने और प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
नारायणी शिला रहा श्रद्वालुओं के लिए बंद
कोरोना काल के चलते पहली बार नारायणी शिला पर श्रद्वालु अपने पूर्वजों के निमित्त श्राद्वकर्म नही कर पाये। प्रशासन की सख्ती तथा सोशल डिस्टेसिंग के कारण इस बार नारायणी शिला को पितृविसर्जन अमावस्या के दिन बंद रखा गया। इस दौरान काफी लोगों को निराश होकर लौटना पड़ा। मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान नारायणी शिला पर पितरों के निमित्त श्राद्वकर्म करने से पितृों को मोझ की प्राप्ति होती है। लेकिन कोरोना काल में कई तरह की प्रशासकीय बंदिश के कारण पहली बार अमावस्या के दिन नारायणी शिला आम श्रद्वालुओं के लिए बंद रहा।