देवसंस्कृति विवि में याज्ञवल्क्य यज्ञ अनुसंधान केन्द्र का शुभारंभ

 हरिद्वार। देवसंस्कृति विवि में प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने याज्ञवल्क्य यज्ञ अनुसंधान केन्द्र का शुभारंभ किया। यहां सन् 1949 में स्थापित ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में चल रहे यज्ञौपैथी को आगे बढ़ाते हुए आधुनिक रूप दिया जा जायेगा। विवि के कुलाधिपति डॉ. प्रणव पण्ड्या और कुलसंरक्षिका शैलदीदी ने केन्द्र की प्रगति के लिए शुभकामनाएं दीं। इस मौके पर प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि विवि से यज्ञ विज्ञान को लेकर सात शोधार्थियों ने पीएचडी की है। उनके अनुभवों को ध्यान में रखते हुए इस केन्द्र का शुभारंभ किया गया है। इन दिनों भारतीय संस्कृति के दो आधार यज्ञ और गायत्री की महिमा को आधुनिक रूप देते हुए जन-जन तक पहुंचाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि केन्द्र में माइक्रो बायोलॉजी, फायटो केमिकल, एन्वॉयरन्मेंटल, प्लांट फिजियोलॉजी, ह्यूमन एलेक्ट्रोफीसिओलॉजी की लैब बनाई गई है। जिससे यज्ञ के धुएं से रोगकारक बैक्टीरिया पर प्रभाव, समिधा एवं यज्ञीय धूम्र का हवा, पानी और मिट्टी पर प्रभाव, यज्ञीय धूम्र में सन्निहित तत्वों का प्रभाव, यज्ञीय धूम्र का विभिन्न मानवीय कोषों पर प्रभाव, शारीरिक एवं मानसिक स्तर पर होने वाले प्रभाव, यज्ञ का वनस्पति एवं कृषि पर प्रभाव आदि विषयों पर शोध किये जायेंगे। इसके लिए एयर सैम्पलर, रोटरी-एवापोरेटर, लायोफिलाइजर आदि आधुनिक मशीन लगाई गयी हैं। इन दिनों विवि में यज्ञौपैथी के माध्यम से डायबिटीज, उच्च रक्तचाप, वात रोग, मानसिक रोग, थायराइड आदि रोगों पर शोध हो रहा है। इसमें संतोषजनक परिणाम भी मिल रहे हैं। इस अवसर पर विभागाध्यक्ष डॉ. विरल पटेल, डॉ. वन्दना श्रीवास्तव आदि उपस्थित रहे।


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