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परंपरांओं का उल्लंघन कर किन्नर अखाड़े को मान्यता नहीं दी सकती है-बाबा हठयोगी

 


हरिद्वार। दिगंबर अणी अखाड़े के स्थानीय प्रतिनिधि व अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के पूर्व प्रवक्ता बाबा बलराम दास हठयोगी ने कहा है कि आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा स्थापित अखाड़ा परंपरा का उल्लंघन कतई स्वीकार नहीं कि जाएगा। किन्नर अखाड़े को लेकर अखाड़ा परिषद के महामंत्री श्रीमहंत हरिगिरी के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते बाबा हठयोगी ने कहा कि सदियों से चली आ रही अखाड़ा पम्परा के तहत केवल तेरह अखाड़ों को ही मान्यता प्राप्त है। ऐसे में परंपराओं का उल्लंघन कर किसी नए अखाड़े को मान्यता नहीं दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि तीन बैरागी अणियों में 18 अखाड़े शामिल हैं। लेकिन सभी बैेरागी अखाड़े तीनों अणियों के साथ ही कुंभ मेले में शाही स्नान करते हैं। श्रीमहंत हरिगिरी चाहें तो जूना अखाड़े के साथ किन्नर अखाड़े को भी स्नान करा सकते हैं। लेकिन परंपरांओं का उल्लंघन कर किन्नर अखाड़े को मान्यता नहीं दी सकती है। इससे गलत परंपरा प्रचलित होगी और समाज का कोई वर्ग अखाड़ा गठित कर शाही स्नान की मांग कर सकता है। जिससे अनावश्यक रूप से विवाद उत्पन्न होगा। बाबा हठयोगी ने कहा कि सरकार व मेला प्रशासन के पास उपलब्ध कुंभ मेला संबंधी रिकार्ड में भी केवल तेरह अखाड़ों का उल्लेख है।बाबा हठयोगी ने अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष श्रीमहंत नरेंद्र गिरी महाराज के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि इस मामले को लेकर उनका दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट व सराहनीय है। श्रीमहंत नरेंद्र गिरी महाराज पारदर्शिता रखते हुए बिना किसी भेदभाव के तथा कोई नया विवाद उत्पन्न ना हो इसके लिए प्रयास कर रहे हैं। श्रीमहंत नरेंद्र गिरी महाराज परंपराओं के साथ हैं और परंपराओं को पथभ्रष्ट नहीं होने देना चाहते हैं। श्रीमहंत हरिगिरी महाराज द्वारा अखाड़ा परिषद के महामंत्री पद से इस्तीफा दिए जाने संबंधी बयान पर बाबा हठयोगी ने कहा कि यह उनका निजी निर्णय हैं। वे यदि पद पर नहीं रहना चाहते हैं तो पद छोड़ सकते हैं। किसी को कोई एतराज नहीं होगा। लेकिन सदियों से चली आ रही अखाड़ा परंपरा का उल्लंघन कर नए अखाड़ों को मान्यता नहीं दी जा सकती है। श्रीमहंत हरिगिरी महाराज ने किन्नर अखाड़े से जो भी वादा किया है उसे पूरा करना उनका काम है। लेकिन परंपराओं का उल्लंघन कतई स्वीकार नहीं होगा। महंत प्रह्लाद दास ने कहा कि जगद्गुरू शंकराचार्य द्वारा तेरह अखाड़ों का गठन किया गया था। उसी परंपरा को संत समाज अनादि काल से निभाता चला आ रहा है। किसी भी परिस्थिति में चैदहवें अखाड़े का गठन नहीं होने दिया जाएगा। 


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