संस्कृत के प्रचार- प्रसार के लिए संस्कृत कुम्भ का आयोजन

 हरिद्वार। प्रदेश की द्वितीय राजभाषा संस्कृत के प्रचार- प्रसार के लिए उत्तराखण्ड संस्कृत अकादमी ने नीलधारा सेक्टर में ‘संस्कृत कुंभ का आयोजन किया। जिसमें शुक्ल यजुर्वेद का पाठ, ‘कुम्भपर्वणः आध्यात्मिकं, सांस्कृतिकं, सामाजिकं वैज्ञानिकं च महत्त्वम् विषय पर संस्कृत संगोष्ठी, संस्कृत कवि सम्मेलन तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। कार्यक्रमों का शुभारंभ नाभा पीठाधीश्वर नाभाद्वाराचार्य सुतीक्ष्ण देवनारायण, परमहंस आश्रम के अध्यक्ष सोहम् बाबा, गरीबदास आश्रम के अध्यक्ष महंत रविदास शास्त्री, रामनिवास आश्रम के अध्यक्ष महंत दिनेशदास, राष्ट्रपति पुरस्कृत विद्वान् डॉ. ओमप्रकाश भट्ट एवं अकादमी के सचिव डॉ. आनंद भारद्वाज ने दीप प्रज्ज्वलन कर किया। नाभाद्वाराचार्य सुतीक्ष्ण देवनारायण ने कहा कि गंगा दर्शन मात्र से ही मनुष्यों के जन्म जन्मांतर के पाप विनष्ट हो जाते हैं। ऐसी पतित पावनी गंगा में स्नान साक्षात् मोक्ष प्रदायक होता है। उन्होंने कहा कि गंगा के तीर पर निवास के लिए देवता भी लालायित रहते हैं। इसलिए गंगा की स्वच्छता प्रत्येक सनातनी का परम कर्तव्य है। अध्यक्षता करते हुए सोहम् बाबा ने कुंभ पर्व का उद्देश्य बताते हुए कहा कि उस अमृत स्वरूप परमपिता परमात्मा की प्राप्ति ही कुंभ पर्व का मुख्य उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि संतों के हृदय में वह अमृत (पर ब्रह्म) बसा रहता है, अतः कुंभ पर्व के अवसर पर संत-समागम के सान्निध्य में उस अमृत की खोज करने की बात हमारे ऋषि-मुनियों ने बताई है। अकादमी के सचिव डॉ. आनंद भारद्वाज ने कहा कि ब्रह्मांड में सर्वप्रथम ओम की ध्वनि उत्पन्न हुई। संसार की सारी पूजा पद्धतियां ओंकार से ही निकलीं हैं। डॉ. ओमप्रकाश भट्ट ने संक्षिप्त में देवासुर संग्राम, समुद्र मंथन तथा उससे उत्पन्न अमृत कुंभ, तत्पश्चात् हरिद्वार आदि चार स्थानों में अमृत की बूंदें गिरने के कारण आरंभ कुंभ पर्व की महत्ता बताई। इससे पहले नित्यानंद वेद विद्यालय कनखल के वेदाचार्य नवीन चंद्र उप्रेती एवं दिनेश गडकोटी के निर्देशन में 15 वेदपाठियों ने शुक्ल यजुर्वेद का पाठ किया गया। कार्यक्रम का संचालन अकादमी के शोध अधिकारी डॉ. हरीश चंद्र गुरुरानी ने किया। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि महंत रविदास शास्त्री ने कहा कि वेद, पुराण आदि शास्त्रों के कारण ही हमारी सनातन संस्कृति बची हुई है। उन्होंने कहा कि संस्कृत की रक्षा से ही संस्कृति और मानवता की रक्षा की जा सकती है। इस अवसर पर आयोजित संस्कृत कवि सम्मेलन में डा. निरंजन मिश्र, आचार्य रामचंद्र वैजापुरकर, डॉ. शैलेशकुमार तिवारी, डॉ. प्रकाश चन्द्र पन्त ने हरिद्वार में कुंभ पर्व के माहात्म्य एवं कोरोना पर आधारित कविताओं का पाठ कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। इस मौके पर महंत दिनेश दास, पूर्व दर्जाधारी नेपाल सिंह, कुम्भ मेला के वित्त नियन्त्रक वीरेन्द्र कुमार, अनिल पांडेय, प्रकाशन अधिकारी किशोरीलाल रतूड़ी, राजकीय शिक्षक संघ के अध्यक्ष जितेन्द्र सिंह, मंत्री दर्शन सिंह, लेखाकार राधेश्याम, प्रशासनिक अधिकारी लीला रावत, सुशील मैठाणी, अजय, पंकज, मोहित, कविता आदि उपस्थित थे।


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