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वेद एवं गीता में, ज्ञान, कर्म और उपासना की अवधारणा विषय पर वेबीनार का आयोजन

 

हरिद्वार। भारत विकास परिषद मंदाकनी शाखा, हरिद्वार एवं दर्शन शास्त्र विभाग, गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में वेद एवं गीता में, ज्ञान, कर्म और उपासना की अवधारणा विषय पर वेबीनार का आयोजन किया गया। सर्वप्रथम डॉ भारत वेदालंकार ने गायत्री मंत्र का पाठ कर वेबिनार का शुभारंभ कराया। वेबिनार का उदघाटन करते हुये गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय दर्शन विभाग के प्रो सोहनपाल सिंह ने कहा कि वेदों के विषय में समाज में काफी भ्रम फैला हुआ है। इस भ्रम को दूर करने की आवश्यकता है। वेदों को पाँच बताया जा रहा है जो कि भ्रामक है। महर्षि दयानन्द सरस्वती का संदर्भ देते हुये प्रो आर्य ने बताया कि वेद केवल चार ही है ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद। सनातन धर्म में वेदों का स्थान सम्मान जनक हैं। वेद हमारे धर्म के पवित्र साहित्य हैं तथा वेद विश्व के सबसे पुराने साहित्य भी हैं। वेद सनातन संस्कृति के आधारशीला हैं। वेद से ही भारतीय सस्कृति इतनी समृध्द और विकसित हैं, यह भारतीयों के जीवन की शैली का आधार हैं। गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो रूप किशोर शास्त्री ने बतौर मुख्य अतिथि वेद गीता में ज्ञान कर्म उपासना की अनेक श्लोकों द्वारा व्याख्यान करते हुये कहा कि सही ज्ञान वह है जो व्यक्ति को परमात्मा के नजदीक ले जाए अर्थात मोक्ष की प्राप्ति कराये। उन्होने कहा उपासना, ज्ञान, कर्म एक दूसरे के पूरक है। ये तीनों एक दूसरे के पूरक व सहयोगी हैं। इनका परस्पर अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। केवल स्तुति, केवल प्रार्थना व केवल उपासना से लाभ नहीं मिलता है। स्तुति, प्रार्थना, उपासना का एक और अर्थ ज्ञान, कर्म उपासना भी लेते हैं। जे0एस0 पी0जी0 कालेज अमरोहा के डा0 अशोक कुमार आर्य ने विशिष्ट अतिथि कहा कि वेद ज्ञान का भंडार है। वेद का पढ़ना-पढाना, सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है। उन्होने कहा आर्य समाज के प्रथम नियमों में ज्ञान का उल्लेख है। वेद का संबंध सर्वभौमिक है, वेद है सर्वोच्च धर्मग्रंथःवेद, स्मृति, गीता, पुराण और सूत्रों में नीति, नियम और व्यवस्था की अनेक बातों का उल्लेख मिलता है। उक्त में से किसी भी ग्रंथ में मतभेद या विरोधाभास नहीं है। संरक्षक इं0 मधुसूदन आर्य ने वेबिनार का संचालन करते हुये कहा कि व्यक्ति को ज्ञानपूर्वक, न्याय पूर्वक तथा त्याग पूर्वक संसार का भोग करना चाहिए। मनुष्य जिस भी स्थिति में रहे, ज्ञान, कर्म व उपासना के साथ रहे तो निश्चित ही जीवन की नौका पार हो जाएगी। जब मनुष्य के हृदय में ज्ञान की अग्नि प्रज्ज्वलित होगी, तो सब बुरे भाव, भावना, कर्म ज्ञान की अग्नि में भष्म हो जाते हैं। प्राच्य संकाय के संकायाध्यक्ष प्रो ब्रह्मदेव ने शास्त्रों के अध्ययन मात्र से व्यक्ति या समाज का कल्याण नहीं हो सकता। अपितु वेद एवं गीता आदि अध्यात्म के द्वारा बताए गए सिद्धांतों के अनुसार आचरण करने से ही व्यक्ति एवं समाज का कल्याण हो सकता है। राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित प्रो जयदेव वेदालंकार ने कहा कि वेदों में समस्त ज्ञान विज्ञान विद्यमान हैं। वैदिक जीवन पद्धति के द्वारा व्यक्ति वर्तमान की सभी समस्याओं का समाधान आसानी से कर लेता है। भारत विकास परिषद मंदाकनी शाखा, हरिद्वार के अध्यक्ष रोटेरियन राजीव राय ने कहा कि वैदिक भाषा भारत की शास्त्रीय भाषा है और प्राचीन काल से एक सतत सांस्कृतिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है। कुछ भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में भारतीय और पश्चिमी दोनों विद्वानों द्वारा वैदिक अध्ययन में अनुकरणीय कार्य किया गया है। वेद अध्ययन से भविष्य में आने वाली पीढ़ी भी अवगत हो सकेंगे। दर्शन शास्त्र के प्रमुख छात्र हरभजन सिंह, तरंजीत सिंह, ममता, हिमांशु मिश्रा, विकास राणा एवं राहुल ने भी अपने-अपने व्याख्यान दिये। वेबिनार में डॉ बबलू वेदालंकार, डॉ बबीता शर्मा, डॉ मनोज, डॉ मीरा त्यागी, लायन एस आर गुप्ता, डॉ मनीषा दीक्षित, जितेंद्र कुमार शर्मा, विमल कुमार गर्ग, डॉ पंकज कौशिक, हेमंत सिंह नेगी, रेखा नेगी, अजय दुर्गा, आकांक्षा, अमित कुमार, अर्चना सिंघल, दीपक कुमार, हरमीत कौर, गुरमीत, दिलप्रीत कौर, धीरज मलखानी, ध्रुव कुमार, रेखा जोशी, राम सेवक, राजेंद्र मीना, मूल चंद्र मीना, मनोज तंवर, विनीता सिंह, विक्रांत कौशिक, विजय कुमार, सुषमा सिंह, सुनील कुमार, स्वामी परमानंद इत्यादि उपस्थित रहे। वेबिनार की अध्यक्षता शाखा के अध्यक्ष रोटेरियन राजीव राय की।


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