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महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक के लिए गंगाजल लेकर रवाना होने लगे है कांवड़ियें

 दो साल बाद फिर दिखने लगी शिवभक्तों की भीड़


हरिद्वार। कोरोना के चलते लगे दो वर्ष के प्रतिबंध के बाद इस वर्ष फाल्गुनी कावड़ यात्रा शुरू होने से धर्मनगरी की रौनक लौटने लगी है। फाल्गुनी मास में लगने वाले कांवड़ मेले के कारण तीर्थनगरी मे धर्म और अध्यात्म का रंग गाढ़ा हो चला है। सिंदूरी आभा बिखेर रही धर्मनगरी मे चारो ओर बम बम भोले के जयकारे गुंजायमान है। धर्मनगरी पर फाल्गुनी कांवड़ का रंग चढ़ना शुरू हो गया है। भगवान शिव शंकर की उपासना को समर्पित फाल्गुनी कांवड़ यात्रा के चलते धर्मनगरी मे हर की पौड़ी पर कावड़िये जल भरते नजर आ रहे है। रक्तवर्णी और पीतांबर वस्त्र धारण कर कावंडिये आस्था की डगर पर चलते दिखाई है। जिसके चलते गंगाद्वार की हदय स्थली हरकी पौड़ी मे भारी भीड़ जुटनी शुरू हो गयी है। धर्मनगरी में जगह जगह कावड़िये की भीड़ होने लगी है। फाल्गुनी मॉस में पड़ने वाली शिवरात्रि का सवयम में विशेष महत्त्व है। इस दौरान भले ही सावन की तुलना में कम शिवभक्त कावड़िये हरिद्वार आते हों लेकिन फिर भी इनके आगमन से धर्मनगरी गुंजायमान रहती है। भक्ति की धुन मे लीन कांवड़ियो की जुबा पर बम बम भोले के जयकारे है। मन मन्दिर मे भक्ति की अखंड ज्योत प्रज्ज्वलित है और चेहरो पर भक्ति के भाव। दो वर्ष बाद धर्मनगरी का नजारा एकदम जुदा है। महाशिवरात्री पर कांवड़िये अपने अपने नगरो व कस्बो के शिवालयो मे जलाभिषेक करेगे।  पंडित मनोज त्रिपाठी कहना है कि भगवान शिव को जल चढ़ाना सदैव ही व्यक्ति के लिए योग कारक होता है मनोकामना पूर्णता देता ही देता है परंतु फागुन मास में विशेष तौर पर फलदाई इसलिए है क्योंकि यही वह समय है जिस समय भगवान शिव और पार्वती का विवाह हुआ था फागुनी कावड़ के समय जिस समय जल उठाकर के हरिद्वार जैसी पवित्र जगह से अपने इष्ट देव के मंदिर में जब चल चलते हैं तो व्यक्ति की मनोकामना पूर्ण होने के साथ-साथ उसको दांपत्य जीवन का सुख भी मिलता है जिन लोगों के विवाह नहीं हो रहे उन लोगों के विवाह संपन्न हो जाते हैं और सदैव घर में सुख शांति शुभ काम आरंभ हो जाते है यही वह समय है फागुन के समय पर जो लोग जल चढ़ाते हैं शिव जी को उन लोगों के बहुत प्रकार के दोष शांत हो जाते हैं चाहे वह शारीरिक रूप से है या वह मानसिक है या वह उन लोगों को सामाजिक रुप से किसी प्रकार की परेशानी चल रही हो मात्र जल चढ़ाने से उनके मन की इच्छाएं पूर्ण होनी शुरू हो जाती हैं। इस समय पर विशेष तौर पर जल चढ़ाने से क्योंकि ग्रीष्म ऋतु आरंभ हो चुकी होती है भगवान शिव की प्रसन्नता अधिक प्राप्त होती है, फागुनी कावड़ और श्रावण मास की कावड़ में यह मुख्यता अंतर है कि श्रावण मास की कावड़ मैं जो शिव के नंदी है वह लोग कावड़ियों के रूप में पधारते हैं और इस समय गृहस्थी लोग जो होते हैं जो शिव की पूजा शिव पार्वती संयुक्त रूप से पूजा करते हैं शिव के साथ-साथ पार्वती जी सती माता की भी कृपा लेना चाहते हैं वह लोग हरिद्वार से जल चढ़ाते हैं ताकि उनके घर की सुख समृद्धि आदि बनी रहे इसीलिए इस समय देखिए कि बहुत ही शांतिपूर्वक कावड़ चलती है ना कोई बहुत ज्यादा हुल्लड़ होता है ना बहुत ज्यादा डाक कावड़ चलती है शांतिपूर्वक चलती है और लोगों की मनोकामना इस समय शांतिपूर्वक पूर्ण होती हैं। बुलंदशहर से आए विक्रांत भाटी का कहना है की इसकी मान्यता अच्छी बताया जाती है और हमारे गांव के काफी लोग कांवड़ लेकर गए हैं हमारे ताऊ 21 बार कावड़ लेकर गए हैं अब हम भी पहली बार कांवड लेकर जा रहे हैं।कावड़िया अमित बैरागी का कहना है कि वे रुद्रपुर से आए हैं और कहना है कि मैं एक समय में बहुत ज्यादा नशा करने लगा था मैंने भोलेनाथ से दुआ मांगी कि अगर नशा छूट जाएगा ड्रग्स छूट जाएगी तो मैं आपके घर पर हर साल आऊंगा और आज वह दिन है कि मैं ड्रग को हाथ नहीं लगाता हूं इसीलिए कावड़ लेकर जा रहा हूं जो वादा भगवान से किया था उसे पूरा करने के लिए कावड़ लेकर जा रहा हूं यह आठवीं कावड़ है जो मैं यहां से लेकर जा रहा हूं। मथुरा से आए बाबू लाल का कहना है कि कावड़ ले जाने की मान्यता है तभी तो हम कावड़ लेने के लिए आए हैं पहली बार आए हैं मन में कामना है मन्नत है तभी तो कावड़ लेने के लिए आए हैं यहां। मथुरा के योगेंद्र सिंह का कहना है कि हम आज से भगवान शंकर की कावड़ लेने के लिए आए है मान्यता क्या है अपनी श्रद्धा है मन की भाव है भगवान को पूजनीय मानते हैं। उनकी श्रद्धा के अनुसार हम हर साल का नियम है जो उसे चलाते हैं लगभग 350 किलोमीटर जाना है पैदल ही करेंगे। वही दूसरी ओर कांवड़ मेला के परवान चढ़ने से स्थानीय व्यापारियों के चेहरे पर रौनक बढ़ने लगी है। जबकि पुलिस प्रशासन की ओर से लगातार सुरक्षा के जरूरी इंतजामात किये जा रहे है।


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