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विश्व आद्रभूमि दिवस के उपलक्ष्य में वेबीनार आज,होगा प्रतियोगिता का आयोजन

 हरिद्वार। विश्व आद्रभूमि दिवस (02 फरवरी) के उपलक्ष्य मे गुरुकुल कांगड़ी (समविश्वविद्यालय) के जन्तु एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग द्वारा एक वेबीनार का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें निबन्ध लेखन, पोस्टर प्रतियोगिता व स्लोगन प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है, सेकोन, कोयम्बटूर के वैज्ञानिक डा0 आशुतोष, जेड. एस. आई. देहरादून से डा0 अनिल, जी0 बी0 पन्त हिमालयन इंस्टिट्यूट से डा0 अंकिता दास व गढ़वाल विश्वविद्यालय से प्रो0 प्रकाश नौटियाल विशेष व्याख्यान देगें। कार्यक्रम संयोजक व पर्यावरणविद् डा0 दिनेश भट्ट ने बताया कि कार्यक्रम में स्कूल, कालेज व विश्वविद्यालय से लगभग 300 प्रतिभागी प्रतियोगिता व व्याख्यान में भाग लेंगे। यह कार्यक्रम ‘‘वर्ड वैटलैण्ड डे’’ के नाम से 02 फरवरी को मनाया जाता है और भारत व राज्य सरकार द्वारा आद्रभूमि के संरक्षण के बारे में जनजागरूकता हेतु सेलीबे्रट किया जाता है। उक्त कार्यक्रम मे कुलपति प्रो0 रुप किशोर शास्त्री व विभागाध्यक्ष प्रो0 डी0 एस0 मलिक प्रतिभागियों को सम्बोधित करेगें। सर्वविदित है कि आद्रभूमि (वैट लैण्ड, दलदली भूमि तालाब, पोखर, झील आदि) हमारे जीवन में पर्यावरण, आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं। इनके महत्व एवं उपयोगिता को देखते हुए,‘जैव-विविधता का स्वर्ग’ एवं ‘बायोलाॅजिकल सुपर मार्केट’ भी कहा जाता है। परन्तु दुःख का विषय है कि विगत कुछ दशकों से हमारी महत्वपूर्ण आद्रभूमि गहरे संकट में है। आद्रभूमिया कुल भू-सतह के लगभग 6ः हिस्से को कवर करती हैं। पौधे और जानवरों की सभी 40ः प्रजातियां आद्र भूमि में रहती हैं। आद्रभूमिया हमारे प्राकृतिक पर्यावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है।भारत मे एक तिहाई वैटलैंड शहरीकरण एवं कृषि भूमि विस्तार की भेंट चढ गये है। पिछले चार दशको मे ही ऐसा हुआ है। जनसंख्या मे तेजी से बढोतरी भी वैटलैंडस के खत्म होने प्रमुख वजहो मे से एक है। यूनेस्को के अनुसार, आद्रभूमि के अस्तित्व पर खतरा उत्पन्न होने से विश्व के उन 40ः वनस्पतियों एवं जीवों पर प्रतिकूल असर पडेगा जो आद्रभूमि मे पाये जाते है या प्रजनन करते है।संविधान के मुताबिक देश के नागरिकों के कर्तव्यों मे पर्यावरण को बचाये रखना भी शामिल है। इसमे जंगल, वन्यजीव,नदी, झील सब शामिल है। आम जनता को भी इन वैटलैंड संरक्षण के प्रति जागरूकता बनाये जाने की जरुरत है। भारत के पर्यावरण संरक्षण कानून 1986 मे भी वैटलैंड संरक्षण की बात की गई है।


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