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केरलवासियों के आध्यात्मिक तीर्थ संवाद सत्र का समापन

२५० से अधिक नर-नारियों ने सीखे योग और साधना

 हरिद्वार। भारतीय संस्कृति विश्व संस्कृति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने कहा कि भारत संत, महापुरुषों की धरती है। भारतीय संस्कृति व सभ्यता विश्व की सर्वाधिक प्राचीन और समृद्ध संस्कृति व सभ्यता है। इसे विश्व की सभी संस्कृतियों की जननी के रूप में माना जाता है।    डॉ.पण्डया केरलवासियों के आध्यात्मिक तीर्थ संवाद सत्र के विदाई समारोह को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में जीवन जीने की कला हो या विज्ञान हो सभी का विशेष स्थान रहा है। कई देशों की संस्कृतियाँ तो समय के साथ-साथ बदलाव होती रही हैं, किंतु भारत की संस्कृति व सभ्यता आदिकाल से ही अपने परंपरागत अस्तित्व के साथ अजर-अमर बनी हुई है। इससे पूर्व केरलवासियों भाई बहिनों ने गायत्री परिवार प्रमुखद्वय डॉ.प्रणव पण्ड्या एवं श्रद्धेया शैलदीदी से भेंट परामर्श किया। प्रमुखद्वय ने सभी परिजनों के उज्ज्वल भविष्य हेतु मंगलकामना दी। इस अवसर पर प्रमुखद्वय ने २३ से २५ दिसम्बर २०२२ को कोचीन में १०८ कुण्डीय गायत्री महायज्ञ की घोषणा की। इसके साथ ही शांतिकुंज स्थित दक्षिण भारत प्रकोष्ठ महायज्ञ तैयारी में जुट गया। पं० शिवप्रसाद मिश्र ने कहा कि साधक के जीवन में गुुरु का विशेष महत्त्व है। सद्गुरु के सानिध्य में साधक जब साधना करता है,तो उसका फल अवश्य मिलता है। सात दिन तक चले इस आध्यात्मिक तीर्थ संवाद शिविर में कुल अठ्ठाइस सत्र सम्पन्न हुए, जिसमें योगाभ्यास,साधना, संस्कार एवं बौद्धिक कक्षाएँ शामिल हैं। केरलवासियों ने पहली बार शांतिकुंज में शुक्ल यजुर्वेदीय विधान से रुद्राभिषेक किया। ऐसे दक्षिण भारत में कृष्ण यजुर्वेदीय विधान से वैदिक कर्मकांड कराने की परपंरा है। शिविर में शांतिकुंज के विषय विशेषज्ञों प्रो. प्रमोद भटनागर, डॉ. गायत्री शर्मा, केदार प्रसाद दुबे, डॉ.कामता साहू, डॉ.गोपाल शर्मा, ज्योतिष प्रभाकरन, उमेश शर्मा, एमटी विश्वनाथन, श्रीमती प्रशांति शर्मा आदि विभिन्न विषयों पर संबोधित किया।शिविर संयोजक के बताया केरल प्रदेश के चैदह जनपद तिरुवनंतपुरम, पथनांतिटा, कोल्लम, कोट्टायम, अलप्पी, इदुकी, कोचीन, त्रिशूर, पालघाट, मलापुरम, कोझीकोड,कन्नूर, वायनाड, कासरगोड के दो सौ पचास से अधिक साधकों ने भाग लिया।


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